Himalayan & Mountain Shrines
बाबा केदारनाथ - भक्ति और मुक्ति के दाता
सभी शिवभक्त बाबा केदार का स्मरण करते ही आनंद विभोर हो जाते हैं। प्रत्येक वर्ष शंकर के लाखों दीवाने उनका अनुभव करने उत्तराखण्ड की इन वादियों में आते हैं।
सभी शिवभक्त बाबा केदार का स्मरण करते ही आनंद विभोर हो जाते हैं। प्रत्येक वर्ष शंकर के लाखों दीवाने उनका अनुभव करने उत्तराखण्ड की इन वादियों में आते हैं। दर्शन की यात्रा और लम्बी कतारें शरीर को थका देती हैं परन्तु इस प्रक्रिया में भीतर की चेतना खिल उठती है। द्वादश ज्योतिर्लिंग में ग्यारहवें क्रम में बाबा केदारनाथ आते हैं। रुद्रप्रयाग जिले और मंदाकिनी के तट पर सुशोभित इस ज्योतिर्लिंग की ऊँचाई लगभग बारह हजार फुट है। बाकी ज्योतिर्लिंग की तुलना में यहाँ पहुँचना थोड़ा जटिल है और शरीर की क्षमता को टेस्ट करने वाला है।
केदारनाथ जी पंचकेदारों में प्रथम और उत्तराखण्ड के चार धामों में से एक हैं। पौराणिक इतिहास के अनुसार मंदिर का यहाँ निर्माण पाण्डवों ने करवाया था, जिसका जीर्णोद्धार आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य जी ने करवाया। यह मन्दिर कत्यूरी शैली में बड़े बड़े शिलाखण्डों को आपस में जोड़कर बनाया गया है। यहाँ स्थित स्वयंम्भू शिवलिंग त्रिकोणीय आकृति में है और अपनी दिव्यता एवं सुन्दरता से अभिभूत कर रहा है।

मन्दिर तक पहुँचने का मार्ग तो शारिरिक श्रम और दृढ़ता मांगता ही है, वहीं यहाँ का मौसम ऐसा है कि साल के छह माह भारी बर्फबारी के कारण मन्दिर के कपाट बन्द रहते हैं। प्रत्येक वर्ष अक्षय तृतीया पर कपाट खुलते हैं और कार्तिक पुर्णिमा पर बन्द होते हैं। शीत ऋतु में बाबा केदार की डोली ऊखीमठ के ओम्कारेश्वर मन्दिर में आ जाती है।
केदारनाथ जी की कथा कुछ इस प्रकार है कि कौरवों को पराजित करने के बाद पाण्डव अपने भाइयों कौरवों की हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान शिव की शरण में हिमालय आये। भगवान भोलेनाथ ने भैसें का रूप धारण किया ताकि पाण्डव उन्हें पहचान न सकें। कथा के अनुसार भीम ने उन्हें पहचान लिया और भैसें की पूछ पकड़ ली। भैसें के आगे का हिस्सा पशुपतिनाथ में प्रकट हुआ और पीठ केदारनाथ में। इस प्रकार भगवान शंकर के दो पवित्र स्थानों का उदय हुआ।
बाबा केदार का सन्दर्भ अनेक धर्मग्रंथों में देखने को मिलता है। शिव महापुराण की कोटिरुद्रसंहिता के अध्याय उन्नीस में पांडवों की कथा देखने को मिलती है। साथ ही यह भी उल्लिखित है जो भी भक्त यहाँ का जल ग्रहण करते हैं वे जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। महाभारत का वन पर्व में भी अर्जुन की शिव आराधना एवं किरात के रूप में शिव के आने का वर्णन मिलता है। इसी में आगे पाण्डवों के स्वर्गारोहण का वर्णन भी मिलता है। स्कन्द पुराण में भी केदारनाथ जी के विषय में लिखा है। स्कन्द पुराण एक पूरा भाग इस क्षेत्र को समर्पित करता है जिसे केदारखंड के नाम से जानते है। यहाँ की पवित्र नदियों एवं वातावरण की दिव्यता का वर्णन भी यहाँ देखने को मिलता है।

केदारनाथ मंदिर के बारे में कुछ हैरान करने वाले तथ्य भी हैं। देहरादून के ‘वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी’ के अनुसार तेरहवीं सदी से सत्रहवीं सदी तक बर्फ में ढका रहा। चार सौ वर्ष बर्फ में रहने के बावजूद मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ। मन्दिर की ऊँचाई पिच्चयासी फुट है और निर्माण इंटरलॉकिंग तकनीक से हुआ है। इस तकनीक में पत्थरों को आपस में फँसाया जाता है। इस तकनीक से मंदिर बनाने से मंदिर भूकम्प या किसी प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित रहता है। मंदिर की दीवारें लगभग बारह फुट मोटी हैं और छत का निर्माण एक ही मोटे पत्थर से किया गया है।

केदारनाथ मन्दिर के ऊपर भीमशिला या भैरव शिला है, जिसका आकार लगभग मन्दिर जितना है। 2013 आपदा में जब चोराबारी झील टूटने सैलाब आया तब यह चट्टान मंदिर से कुछ दूर पर आकर रुक गई। इस चट्टान के कारण नीचे आने वाला पानी दो हिस्सों में बंट गया और मंदिर पर कोई आँच नहीं आयी। इस दैवीय लीला के कारण आज इस शिला की भी पूजा की जाती है।
मंदिर के मुख्य पुजारी जन रावल कहलाते हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी हमेशा कर्नाटक के वीर शैव जंगम समुदाय से ही होते हैं। मुख्य पुजारी अर्थात रावल के निर्देश पर स्थानीय पुजारी अर्थात नायब रावल गर्भ गृह की पूजा सम्पन्न करते हैं। मंदिर की पूजा पद्धति में आज भी कर्नाटक संस्कृति और कन्नड़ भाषा का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है जो कि भारतीय एकता अखंडता का सूचक है।
मुख्य से थोड़ी दूर पर बाबा भैरवनाथ जी का भी मन्दिर है, जिन्हें यहाँ का रक्षक माना जाता है। भक्त मानते हैं कि जब कपाट बंद भी है तब भी बाबा भैरवनाथ मंदिर क्षेत्र की रक्षा करते हैं। मंदिर में अखण्ड ज्योति भी है। जब मंदिर के कपाट बंद होते हैं और दोबार खुलते हैं तो उस बीच अखण्ड ज्योति बिना किसी देखरेख के भी अखण्ड रहती है और मंदिर वैसा ही व्यवस्थित मिलता है।

यहाँ आने वाले शिव भक्त तो आनन्द प्राप्त करते ही है, ऐसी मान्यता है कि यहाँ आने वालों के पूर्वज भी तर जाते हैं। माँ प्रकृति की गोद में भक्त यहाँ अद्भूत आनन्द प्राप्त करते हैं। क्योंकि केदारनाथ पहुँचने में शारीरिक फ़िटनेस आवश्यक है इसीलिए युवावस्था में यहाँ आने का प्रयास करना चाहिए। पवित्र धामों की यात्रा का वास्तविक आनन्द विलासिता में नहीं अपितु साधना और शिव चिन्तन में हैं। जीवन में कम से कम एक बार तो बाबा केदार के चरणों में अवश्य आना चाहिए।
जय बाबा केदार
हर हर महादेव
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