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Personal Essays & Thoughts

Jiivndaan: Social Service, Human Values, and Community Well-Being

This article highlights the purpose, social impact, and spiritual importance of helping others, building a caring society, and inspiring positive change through service, awareness, and collective

By Ashish Kumar 1 min read

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जीवनदान (‌सच्चीघटना)

मेरा एक बहुत अच्छा मित्र है 'भगवती' वह देहरादून में रहता है वह भगवान और पूजा-पाठ में बहुत ज्यादा विश्वास रखता है। वह माता का बहुत बड़ा भगत है और सुबह शाम पूजा किये बिना कुछ भी नहीं खाता-पीता है मूलतः उसका पैतृक गांव केदारनाथ के आस पास है। भगवती के गले में साक्षत देवी सरस्वती विराजती है वो बहुत अच्छा गायक भी है एवं माता के जागरण भी करता है।

सन 2018 में मैंने और भगवती ने केदार नाथ जी के कपाट खुलने के समय दर्शन करने का निर्णय किया।

मंदिर के कपाट अप्रैल के अंत में खुलने थे। मैंने और भगवती ने गौरी कुंड तक अपनी कार में जाने का निर्णय किया। दोपहर के करीब 12 बजे हम दोनों ने गौरी कुंड से पैदल केदारनाथ की यात्रा शुरू कर दी ।

हम करीब दो तीन किलोमीटर ही चले थे की अचानक तेज बारिश शुरू हो गयी और हमारी केदारनाथ जी की ओर जाने की रफ़्तार भी धीमी हो गयी। हम दोनों पूरी तरह से बारिश में भीगे भीगे फिसलन भरे रास्ते से चल रहे थे रास्ते में बहुत से घोड़े और खच्चर हमारे मार्ग में अवरोध उत्पन्न कर रहे थे। रात के करीब नौ बज गए थे और हम दोनों अभी भी केदारनाथ जी के मंदिर से काफी दूर थे।

हम दोनों लिंचोली में थे तभी मेरे मित्र भगवती ने मुझ से कहा, "मित्र ऐसे तो बहुत समय लग जायेगा। यहाँ लिंचोली से एक छोटा रास्ता (Shortcut) मार्ग है अगर हम उस रास्ते से जाते है तो करीब डेढ़ किलोमीटर कम पड़ेगा" मैंने अचरच से कहा, "यार रात के इस समय किसी वैकल्पिक मार्ग से जाना ठीक नहीं है" फिर भगवती ने मुझे समझया के वो पहले भी उस वैकल्पिक मार्ग से जा चूका है लकिन दिन के समय। असमंजस की स्थित में हम दोनों ने उस वैकल्पिक मार्ग से जाने का निर्णय लिया। थोड़ा आगे बढ़ने पर हमे एक अस्थायी चाय की दुकान दिखाई दी। भगवती ने उस चाय वाले से लिंचोली से केदारनाथ मंदिर तक जाने के वैकल्पिक मार्ग के विषय में पूछा, तो उस चाय वाले ने कहा," वो रास्ता यही इस बड़े पत्थर के पीछे से है पर इस समय उस मार्ग से जाना खतरनाक है इस समय इस मार्ग से कोई नहीं जाता, और आज कल उस मार्ग पर लोगो ने सफेद भालू के दिखाई देने की बात भी कही है" हम थोड़े डरे पर मन पक्का करके हम दोनों उसी मार्ग पर बढ़ने लगे। रात्रि के दस बजे थे और हम दोनों ऐसे पहाड़ पर अगले आगे बढ़ रहे थे जिसमे हम दोनों के अतरिक्त और कोई दूर दूर तक नहीं था। चाँद की रोशनी में हम आगे बढ़ रहे थे कुछ आगे जा कर हम रुक गए क्योकि हमे झाड़ो के पीछे कुछ सफेद सा दिखाई दिया हमे लगा की वो सफेद भालू है जिसके विषय में चाय वाले ने भी हमे चेताया था।

हम डर गए क्योकि हम पहाड़ की ऐसी घाटी में थे जहां से वापस जाना भी मुश्किल था। हम दोनों दस मिनट तक वही खड़े रहे। पर जब हमने देखा की वो सफेद आकर्ति हिल डूल नहीं रही है तब हम लोगो ने धीरे से आगे बढ़ कर देखा तो पाया की वो भालू के आकार का एक सफेद पत्थर था। हम लोग फिर से आगे बढ़ने लगे और अब उस वैकल्पिक मार्गे पर चढ़ाई करने लगे। अचनाक ही मुझे बहुत डर लगने लगा। क्योकि उस रास्ते पर जिस पर रात्रि के दस बजे केवल हम दोनों आगे बढ़ रहे थे 2013 में केदारनाथ जी में आयी आपदा में मरे लोगो के कपड़े, जूते, बैग आदि पड़े थे । अचनाक ही मेरी साँस फूलने लगी और मेरा चलना मुश्किल हो गया। मैं दस कदम चलता और उस सुनसान रास्ते पर बैठ जाता मेरा मित्र मुझे ग्लूकोज खिलता और फिर मुझे हिम्मत बंधा कर चलने के लिए बोलता पर मेरी थकान एवं डर हर पल बढ़ रहे थे अब तो मैं बिलकुल भी नहीं चल पा रहा था और दो दो कदम चलने पर ही पत्थरो पर बैठने लगा जिनके चारो और आपदा में मरे लोगो की निशानिया बिखरी पड़ी थी। मेरी हालत देख कर भगवती भी थोड़ा डर गया। अब मुझे लगने लगा था की आज मेरा अंतिम दिन है और अब मैं यही भगवान शिव के द्वार केदारनाथ में ही मर जाऊंगा। तुरंत ही भगवती ने माँ काली के मंत्रो का जाप शुरू कर दिया मैंने स्वयं भी शिव पर ध्यान लगाया। मुझे अचानक ऐसा लगा जैसे एक विराट आकृति मेरे सामने खड़ी है, मेरे पूरे शरीर मे आग जैसी गर्मी होने लगी...अचानक मेरा शरीर ठण्डा हो गया ।

मुझे लगा की मुझे फिर से जीवन मिल गया। 15-20 मिनट में हम केदारनाथ जी के मंदिर के मुख्य मार्ग पर आ पहुंचे जहां से अन्य कई लोग भी मंदिर की ओर जा रहे थे सुबह के करीब एक बजे जैसे ही मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार केदारनाथ मंदिर के दर्शन किये मेरी सारी थकान और डर स्वयं ही चले गए। उस दिन मुझे भगवती ने या फिर स्वयं शंकर भगवान ने जीवनदान दिया.....

जय केदारनाथ 🙏

Written by

Ashish Kumar

Born in Haridwar on 18 September 1980, Ashish grew up in a simple middle-class family rooted in service, discipline, and humility. From an early age, he was deeply curious about both science and Hindu philosophy, creating a lifelong journey that blended rational inquiry with spiritual exploration. A major turning point came in 1999, when a life-threatening illness brought him close to death. That experience transformed his outlook and gave him a powerful purpose: to dedicate his life to helping others. Although he later completed his engineering education and worked in IT, his path was shaped more by struggle than comfort. Repeated setbacks, career disappointments, health issues, and inner restlessness pushed him toward deeper reflection and self-discovery. Over time, Ashish immersed himself in scriptures, meditation, Tantra, Ayurveda, and multiple schools of Indian philosophy, while also studying science, technology, and cosmology. This rare combination of spiritual depth and scientific curiosity became the foundation of his writings and research. His books and papers reflect an effort to unite ancient wisdom with modern understanding. His journey is not only about personal survival, but about transformation through adversity. From illness and uncertainty to writing, research, and philosophical inquiry, Ashish’s life represents the search for truth, meaning, and purpose. His story is important because it shows how suffering can become a force for growth, and how science and spirituality can together shape a meaningful life.

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