Heritage & Architectural Wonder
बिल्वकेश्वर मंदिर - हरिद्वार तीर्थ की चेतना
दिव्य भूमि हरिद्वार के कंकण कंकण में शंकर का निवास है।
यहाँ के देवस्थान शिव - शक्ति के अलौकिक प्रेम की अद्भुद कथा कहते हैं। हरिद्वार के प्रमुख मंदिरों में यह कहना अत्यंत जटिल है कि कौन सा मंदिर पौराणिक एवं आध्यात्मिक रूप से अधिक महत्वपूर्ण और जीवन्त है।
इन्हीं में सबसे प्रमुख स्थानों में से एक हैं श्री बिल्वकेश्वर महादेव जी। जो भी दर्शनार्थी या साधक यहाँ आये हैं उन्होंने यही अनुभव किया कि इस स्थान के सुखद स्पर्श के बिना हरिद्वार और चार धाम यात्रा अपूर्ण है। श्री बिल्वकेश्वर महादेव की ऊर्जा बड़ी शांतिदायक अंतर्मन को प्रफुल्लित करने वाली है। यहां ध्यान करने की जरूरत नहीं यहाँ ध्यान बह रहा है, बस यहाँ आ भर जाना है गोते तो स्वतः शिव की ऊर्जा लगवा ही लेंगी।
शहर के बीच में रेलवे स्टेशन के बेहद पास होने के बावजूद मंदिर प्रांगण में नीरव वन जैसा अनुभव सहज होता है। हो भी क्यों न? जिस परिसर में माँ पार्वती ने तीन हज़ार साल तप किया हो वहाँ कि दिव्यता का बखान शब्द नहीं कर सकते। शिव कृपा से राजाजी नेशनल पार्क के क्षेत्र में आने के कारण ये क्षेत्र अतिक्रमण से सुरक्षित है।
हरिद्वार तीर्थ की चेतना
विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में इस दिव्य देवस्थान की चर्चा देखने को मिलती है। स्कन्द पुराण का केदार खण्ड माता पार्वती की तपस्या का मनमोहक वर्णन करता है साथ ही माँ द्वारा बिल्वपत्र खाकर तपस्या किए जाने के कारण मंदिर के नामकरण का रहस्य उजागर करता है। जब सृष्टि तारकासुर के अत्याचार से तंग थी तब देवताओं के आग्रह पर शक्ति माँ पार्वती के रूप में आयी और नारद मुनि कहने पर महादेव को जगाने का कठिन पुरुषार्थ करने लगी। शिव महापुराण का पार्वती खंड भी इस क्षेत्र का वर्णन करता है और इसके महत्व को बताता है। नीलमत पुराण में भी बिल्वकेश्वर मंदिर के विषय में जानकारी दी गयी है। इस क्षेत्र को बिल्व क्षेत्र कहकर पुकारा गया है।

हरिद्वार के हृदय श्री बिल्वकेश्वर जी त्रेतायुग से यहाँ विद्यमान हैं। यहाँ के शिवलिंग स्वयंम्भू हैं अर्थात स्वयं प्रकट हुए हैं। मन्दिर के आरम्भ की तिथि को निश्चित कर पाना तो सम्भव नहीं है। वर्तमान संरचना बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में बनी है जिसमें संतों, पुजारियों एवं शिवभक्तों की महत्वपूर्ण भूमिका है। जहाँ भारत और विश्व के अनेक देव स्थान राजाओं एवं समाज के अग्रणी वर्ग द्वारा सहयोग से बने हैं वहीं यह मन्दिर किसी एक व्यक्ति या राजा द्वारा निर्मित न होकर सभी शिव भक्तों के प्रयास की देन है।
पूरा मंदिर परिसर लगभग चार हजार स्कॉयर फुट में फ़ैला हुआ है। जिसमें मुख्य मंदिर लगभग डेढ़ हजार स्क्वायर फुट में है। मुख्य मंदिर में प्राचीन नीम के वृक्ष के नीचे सुन्दर शिवलिंग विद्यमान हैं। इन पर नित्य विधिवत अभिषेक सम्पन्न होता है। प्रत्येक पहर की पूजा भी मंदिर के पुजारियों के द्वारा विधि विधान से संपन्न होती है। दिन भर में हजारों शिवभक्त आकर जलाभिषेक भी करते हैं और आनंद प्राप्त करते हैं। संध्या आरती यहाँ का विशेष आकर्षण है। आसपास के लोग नित्य संध्या आरती करते हैं एवं पुण्य के भागी बनते हैं।
मंदिर के प्रवेश मार्ग पर अत्यंत प्राचीन गणपति जी, श्री हनुमान जी, लक्ष्मी - नारायण जी एवं बाबा काल भैरव जी का मंदिर है। संतजन कहते हैं कि मुख्य मंदिर के दर्शन इन मंदिरों के दर्शन के बिना अपूर्ण हैं। काल भैरव जी के मंदिर के बाहर एक धूनी भी जल रही है जिसकी भस्म को मस्तक पर धारण करना अत्यंत लाभप्रद है।
मुख्य गर्भगृह से लगभग तीन सौ मीटर की दूरी पर गौरी कुंड है। अपनी कठोर साधना के दौरान माता पार्वती यहाँ स्नान एवं ध्यान करती थी। पौराणिक वर्णन के अनुसार जब माँ पार्वती साधना के क्रम में प्यास से व्याकुल हुई तब स्वयं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी अपने कमण्डल में जो जल लेकर प्रकट हुए भी गौरी कुंड बन गया। इस स्थान की अद्भुद ऊर्जा एवं दिव्य शान्ति इस बात की परिचायक है। शिव - शक्ति के उपासक यहाँ आकर ध्यान करते हैं एवं बह रही पवित्र सरिता का स्पर्श कर भक्तिमय हो जाते हैं। गौरी कुंड जाने का मार्ग भक्तों को वन के जीवन की अनुभूति करवाता है और मन की हलचल को थाम लेता है। भक्तों के मान्यता है कि इस क्षेत्र में माता की कृपा माँ भुवनेश्वरी के रूप में निरंतर बरस रही है। श्रद्धावान लोग यहाँ मौजूद पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर जाते हैं और मानते हैं कि मान्यता है कि उतने तल का घर माँ की कृपा से उन्हें प्राप्त हो जाता है।
मंदिर परिसर में अखण्ड ज्योति अनेक दशकों से प्रज्ज्वलित है जिनके दर्शन से भ्रम शान्त होता है और भक्ति का उदय होता है। साथ ही मंदिर परिसर में दो बड़े हॉल हैं, जहाँ पर्व - त्योहारों पर विभिन्न कार्यक्रम संपन्न होते हैं। परिसर में छोटी गौशाला है जो सभी को गो वंश के संरक्षण की प्रेरणा देती है एवं अभिषेक के दुग्ध आदि की आवश्यकता को पूर्ण करती है। मंदिर परिसर में ही यहाँ के पुजारियों के रहने की व्यवस्था है ताकि दैनिक क्रम सहजता से संपन्न हो सके।
यदि आप कभी हरिद्वार आते हैं तो आपको बिल्वकेश्वर मंदिर अवश्य आना चाहिए। वास्तव में दिव्यता वर्णन से अधिक अनुभव का विषय है अतः, इस चैतन्य क्षेत्र में जाकर भीतर की चेतना का अनुभव अवश्य करना चाहिए।
हर हर महादेव
जय शिव शम्भो
जय माँ पार्वती
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