Spiritual Guides and Gurus
द्वाराहाट: महावतार बाबाजी की साधना स्थली और क्रिया योग की शाश्वत परंपरा
इसकी भौगोलिक संरचना में ऐतिहासिक द्वाराहाट कस्बा, सिद्ध शक्तिपीठ दूनागिरी और अंतिम मोटर मार्ग बिंदु कुकुछीना शामिल हैं, जो महावतार बाबाजी की गुफा के मुख्य प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करते हैं ।
द्वाराहाट: महावतारबाबाजीकीसाधनास्थली, कत्यूरीवास्तुकलाऔरक्रियायोगकीशाश्वतपरंपरा
उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में स्थित अल्मोड़ा जिले का एक शांत कस्बा द्वाराहाट अपनी अनूठी भौगोलिक और आध्यात्मिक स्थिति के लिए प्रसिद्ध है । "स्वर्ग का मार्ग" (द्वारा का अर्थ मार्ग और हाट का अर्थ स्वर्ग) या "उत्तरी द्वारका" के रूप में जाना जाने वाला यह ऐतिहासिक स्थल समुद्र तल से लगभग 1,515 मीटर की ऊंचाई पर चीड़ और बांज के सघन जंगलों से घिरा हुआ है । द्वाराहाट केवल एक प्राकृतिक पर्वतीय स्थल नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत जाग्रत साधना स्थल है जहां प्राचीन काल से ऋषि-मुनि और योगी अपनी आंतरिक चेतना को जागृत करने आते रहे हैं । इसकी भौगोलिक संरचना में ऐतिहासिक द्वाराहाट कस्बा, सिद्ध शक्तिपीठ दूनागिरी और अंतिम मोटर मार्ग बिंदु कुकुछीना शामिल हैं, जो महावतार बाबाजी की गुफा के मुख्य प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करते हैं ।
महावतारबाबाजी: दिव्यगुरुऔरउनकीआध्यात्मिकपृष्ठभूमि
महावतार बाबाजी (अर्थात "महान अवतार आदरणीय पिता") हिमालय की दुर्गम कंदराओं में रहने वाले एक अत्यंत रहस्यमयी और अमर योगी हैं । आधुनिक जगत को उनका पहला परिचय परमहंस योगानंद की सुप्रसिद्ध पुस्तक 'ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी' (एक योगी की आत्मकथा) से मिला, जिसमें बाबाजी को एक मृत्युंजय अवतार के रूप में दर्शाया गया है जो सदियों से मानवता के आध्यात्मिक विकास को निर्देशित कर रहे हैं । बाबाजी को उनके अनुयायियों द्वारा महामुनि बाबाजी महाराज, महायोगी, त्र्यंबक बाबा और शिव बाबा जैसे विभिन्न आदरणीय नामों से पुकारा जाता है ।
यद्यपि बाबाजी का जन्म और इतिहास अत्यंत गोपनीय रहा है, तथापि तमिल सिद्ध परंपरा के कुछ विवरणों के अनुसार उनका जन्म तमिलनाडु के परंगीपेट्टई में हुआ था और उनका मूल नाम नागराजन था । बाल्यावस्था में नागराजन को योगी गोरखनाथ मिले, जिन्होंने उन्हें ध्यान और साधना के मूलभूत सिद्धांत सिखाए और उन्हें महर्षि अगस्त्य से दीक्षा प्राप्त करने का निर्देश दिया । बाद में, श्रीलंका के कतरगाम में गुरु भोगरनाथ ने नागराजन को शक्तिशाली प्राणायाम तकनीक 'वासी योगम' सिखाई, जहां उन्हें भगवान मुरुगन के प्रत्यक्ष दर्शन हुए । बाबाजी के पिता का नाम स्वेथनाथ अय्यर था, जो स्थानीय मुथुकुमारस्वामी मंदिर के मुख्य पुजारी थे ।
बाबाजी के बारे में मान्यता है कि वे सदियों से जीवित हैं और उनकी आयु सदैव 18 से 25 वर्ष के बीच प्रतीत होती है, जिसके कारण उन्हें 'अमर बाबा' भी कहा जाता है । उन्होंने आदि शंकराचार्य और संत कबीर जैसे महान युगप्रवर्तकों को भी योग दीक्षा दी थी । बाबाजी केवल आवश्यकता पड़ने पर ही किसी के समक्ष प्रकट होते हैं और उनका दिव्य शरीर बिना भोजन के भी पूरी तरह स्वस्थ और दीप्तिमान रहता है ।
क्रियायोगकापुनरुद्धारऔरदूनागिरीकीगुफा

आधुनिक काल में क्रिया योग के पुनरुद्धार की ऐतिहासिक घटना इसी क्षेत्र में घटित हुई थी । वर्ष 1861 में, ब्रिटिश सेना के सैन्य लेखा विभाग में कार्यरत श्यामा चरण लाहिड़ी (जिन्हें बाद में लाहिड़ी महाशय के नाम से जाना गया) का स्थानांतरण रानीखेत हुआ । जब वे दूनागिरी पर्वत की वादियों में घूम रहे थे, तब एक दिव्य युवा योगी ने उनका नाम लेकर पुकारा और उन्हें एक गुफा में ले जाकर क्रिया योग की पवित्र दीक्षा दी । इसी दीक्षा के साथ द्वापर युग के बाद इस कलयुग में क्रिया योग का पुनः जन्म हुआ और विश्वभर के सभी क्रियावान इसी 1861 की घटना से अपनी गुरु परंपरा का संबंध जोड़ते हैं ।
दीक्षा के समय, बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय की एक अवचेतन इच्छा को पूर्ण करने के लिए इसी पर्वत श्रृंखला पर एक अद्भुत स्वर्ण महल का निर्माण किया था और इच्छा शांत होने पर उसे पुनः विलीन कर दिया । आज भी वह पवित्र गुफा ध्यान और योग के लिए एक अत्यंत शक्तिशाली केंद्र है, जहां प्रवेश करते ही साधक सकारात्मक ऊर्जा और असीम शांति का अनुभव करते हैं । यह गुफा एक अन्य बड़ी गुफा से भी जुड़ी हुई है, जिसे सुरक्षा कारणों से वर्तमान में बंद कर दिया गया है । गुफा के ठीक बाहर योगदा सत्संग सोसाइटी (YSS) द्वारा एक ध्यान मंच और नीचे 'सत्संग कुटीर' का निर्माण किया गया है । यह स्थान दक्षिण भारतीय श्रद्धालुओं में विशेष रूप से लोकप्रिय है क्योंकि तमिल सुपरस्टार रजनीकांत अक्सर अपनी साधना के लिए इस गुफा की यात्रा करते हैं ।
परिवहन, मार्गविवरणऔरयात्राप्रबंधन
दूनागिरी पहाड़ियों में स्थित बाबाजी की गुफा की यात्रा के लिए सावधानीपूर्वक योजना बनाना आवश्यक है क्योंकि पहाड़ी मार्ग संकरे और तीखे मोड़ों वाले हैं ।
परिवहनविकल्पऔरअनुमानितव्ययतालिका
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प्रस्थानबिंदु / मार्ग |
परिवहनकामाध्यम |
दूरी |
यात्राकीअवधि |
अनुमानितव्यय (INR) |
महत्वपूर्णसुरक्षादिशा-निर्देश |
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दिल्लीसेकाठगोदाम |
ट्रेन (शताब्दी/रानीखेत एक्सप्रेस) या सड़क (NH9) |
~280 - 300 किमी |
5.5 - 7 घंटे (ट्रेन) / 10 - 14 घंटे (सड़क) |
₹350 - ₹1,200 (ट्रेन) / ₹3,000+ (निजी कार) |
काठगोदाम पहुंचने के लिए रात की ट्रेनें सबसे बेहतर हैं ताकि दिन में पहाड़ी यात्रा की जा सके। |
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पंतनगरएयरपोर्टसेद्वाराहाट |
केवल निजी टैक्सी (कोई साझा विकल्प उपलब्ध नहीं) |
~120 - 150 किमी |
5 - 6 घंटे |
₹5,000 - ₹6,500 (एक तरफ) |
दिल्ली से उड़ान केवल 1 घंटे की है, लेकिन हवाई अड्डे से निजी वाहन पहले से बुक करना उचित है। |
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काठगोदामसेद्वाराहाट |
साझा जीप या निजी टैक्सी |
~88 - 120 किमी |
4 - 5 घंटे |
साझा: ₹500 - ₹900 / निजी: ₹3,500 - ₹5,500 |
साझा टैक्सियाँ रानीखेत में बदलनी पड़ती हैं। सुबह जल्दी यात्रा शुरू करना श्रेयस्कर है। |
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द्वाराहाटसेकुकुछीना |
स्थानीय टैक्सी या साझा वाहन |
19 - 25 किमी |
45 - 60 मिनट |
साझा: ₹100 / निजी: ₹800 - ₹1,000 |
मार्ग संकरा और खड़ी चढ़ाई वाला है। सूर्यास्त के बाद कोहरे के कारण यात्रा न करें। |
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कुकुछीनासेबाबाजीकीगुफा |
पैदल ट्रेक (पैदल मार्ग) |
2 - 3 किमी |
1 - 2 घंटे (एक तरफ) |
प्रवेश निशुल्क / गाइड: ₹500 - ₹1,000 |
ट्रेक का अंतिम हिस्सा काफी खड़ी चढ़ाई वाला है। मजबूत जूते और पानी साथ रखें। |
यात्रा के लिए सबसे अनुकूल समय मार्च से जून और सितंबर से नवंबर का है जब मौसम बेहद सुहावना रहता है । मानसून (जुलाई-अगस्त) के दौरान पहाड़ों में भूस्खलन और फिसलन का खतरा रहता है, जबकि सर्दियों (दिसंबर-फरवरी) में तापमान अत्यधिक ठंडा हो जाता है 。
योगदासत्संगशाखाआश्रमद्वाराहाटकीगतिविधियांऔरनियम
द्वाराहाट में वर्ष 1983 में स्थापित योगदा सत्संग शाखा आश्रम परमहंस योगानंद की शिक्षाओं के प्रसार और साधकों को साधना के लिए उपयुक्त वातावरण प्रदान करने का प्रमुख केंद्र है । यह आश्रम मुख्य कस्बे से 1.5 किमी दूर चीड़ के शांत जंगलों के बीच स्थित है । इसके परिसर में एक भव्य ध्यान मंदिर, राधा-कृष्ण मंदिर, एक समृद्ध पुस्तकालय और सुंदर उद्यान हैं ।
यहाँ केवल योगदा सत्संग सोसाइटी (YSS) या सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप (SRF) के पंजीकृत पाठकों और साधकों को ही ठहरने की अनुमति दी जाती है, जिसका मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत या सामूहिक साधना सत्रों में भाग लेना होता है । आश्रम में ठहरने और सात्विक भोजन के लिए कोई निश्चित शुल्क नहीं लिया जाता, बल्कि यह पूरी तरह से स्वैच्छिक दान पर निर्भर है । यहाँ की दिनचर्या अत्यंत अनुशासित है:
आश्रमकीदैनिकसमय-सारणी
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समय |
गतिविधि / साधनासत्र |
विवरणऔरमहत्व |
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प्रातः08:00 बजे |
सात्विक नाश्ता |
हल्का और पौष्टिक भोजन जो ध्यान के अनुकूल हो। |
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दोपहर01:00 बजे |
सात्विक दोपहर का भोजन |
स्थानीय मसालों से युक्त सुपाच्य पारंपरिक भोजन। |
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अपराह्न04:00 बजे |
सायंकालीन चाय |
संध्याकालीन साधना से पूर्व तरोताजा होने का समय। |
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सायं05:30 - 07:00 बजे |
सामूहिक व्यायाम और ध्यान |
शारीरिक ऊर्जा के नियंत्रण (Energization Exercises) और गहरे मौन ध्यान का सत्र। |
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सायं07:00 - 07:45 बजे |
भगवद्गीता कक्षा |
स्वामीजी के मार्गदर्शन में गीता के श्लोकों की आध्यात्मिक व्याख्या। |
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रात्रि08:00 बजे |
सात्विक रात्रि का भोजन |
दिन की गतिविधियों का समापन और मौन व्रत की शुरुआत। |
विशेष रूप से, प्रत्येक गुरुवार को आश्रम में दीर्घकालीन ध्यान सत्र (शाम 4:00 से 6:30 और शाम 7:00 से 9:00 बजे तक) आयोजित किया जाता है, जिसमें कीर्तन और आध्यात्मिक पाठ शामिल होते हैं । रविवार को सुबह 10:00 से 11:30 बजे तक सार्वजनिक सत्संग आयोजित किया जाता है । आश्रम प्रतिवर्ष नेत्र शिविर, स्वास्थ्य शिविर और 25 जुलाई को 'महावतार बाबाजी स्मृति दिवस' के अवसर पर गुफा तक एक भव्य पदयात्रा (शोभायात्रा) का आयोजन करता है ।
पौराणिकमहत्व: दूनागिरीशक्तिपीठऔरपांडुखोलीकीरहस्यमयीगुफाएं

द्वाराहाट क्षेत्र की आध्यात्मिक ऊर्जा केवल क्रिया योग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध रामायण और महाभारत काल की प्राचीन घटनाओं से भी है ।
दूनागिरीदेवीमंदिर: सिद्धशक्तिपीठ
द्वाराहाट से लगभग 15 किमी दूर 8,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित दूनागिरी मंदिर मां दुर्गा के 'वैष्णवी' रूप को समर्पित एक अत्यंत शक्तिशाली सिद्ध पीठ है । पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब लक्ष्मण युद्ध में मूर्छित हुए थे, तब भगवान हनुमान द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर लंका लौट रहे थे । मार्ग में उसी पर्वत का एक छोटा हिस्सा यहाँ गिर गया, जिसके कारण इसका नाम 'दूनागिरी' पड़ा 。 मंदिर की चोटी तक पहुंचने के लिए भक्तों को 365 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं, जो वर्ष के हर दिन का प्रतीक हैं । मंदिर के गर्भगृह में कोई मानव निर्मित मूर्ति नहीं है, बल्कि माँ दुर्गा के प्राकृतिक 'सिद्ध पिंडों' की पूजा की जाती है, जिसके पास एक अखंड ज्योति सदैव प्रज्वलित रहती है ।
पांडुखोली: पांडवोंकीशरणस्थलीऔरगूंजनेवालाबुग्याल
दूनागिरी से आगे पांडुखोली (या पांडव खोली) स्थित है, जिसका शाब्दिक अर्थ 'पांडवों का आश्रय' है । ऐसा माना जाता है कि जुए में अपना सब कुछ हारने के बाद पांडवों ने अपने अज्ञातवास का अंतिम वर्ष इसी अत्यंत दुर्गम ब्रह्म पर्वत श्रृंखला पर ध्यान और योग करते हुए बिताया था ।
पांडुखोलीकीकुछअसाधारणविशेषताएंनिम्नलिखितहैं:
- वीरखंभ (नायकस्तंभ): पांडवों की उपस्थिति के प्रतीक के रूप में स्थापित प्राचीन पाषाण स्तंभ ।
- भीमकीसेय्या (बुग्याल): पांडुखोली के शिखर पर स्थित एक पूरी तरह से बंजर घास का मैदान (बुग्याल) है, जिसे 'भीम की गुदड़ी' भी कहा जाता है । इस मैदान पर धीरे-धीरे चलने पर पैरों के नीचे से एक अजीब गूंजती हुई, खोखली आवाज सुनाई देती है । इसका मुख्य कारण बुग्याल के ठीक नीचे स्थित चार बड़ी रहस्यमयी प्राकृतिक गुफाएं हैं जो अंदर से पूरी तरह खोखली हैं ।
- वज्रदंतीवनस्पति: माना जाता है कि पांडव अपने दांतों को साफ करने के लिए वज्रदंती घास का उपयोग करते थे, जो आज भी इस क्षेत्र में बहुतायत में पाई जाती है और स्थानीय लोग इसे पवित्र स्मृति चिह्न के रूप में अपने घरों में ले जाते हैं ।
- कुकुछीनानामकीउत्पत्ति: जब कौरवों की सेना पांडवों की खोज में यहाँ तक आई, तो वे इस अत्यंत बीहड़ और पहाड़ी मार्ग में खो गए और आगे नहीं बढ़ सके । जिस स्थान पर कौरवों की सेना रुकी और भ्रमित होकर वापस लौट गई, उसे स्थानीय भाषा में 'कौरवछीना' (अर्थात जहां कौरव थककर रुक गए) कहा गया, जो समय के साथ बदलकर 'कुकुछीना' बन गया ।
ऐतिहासिकधरोहर: कत्यूरीराजवंशकेप्राचीनमंदिरसमूह
द्वाराहाट अपनी पुरातात्विक संपदा के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसे प्राचीन काल में "कुमाऊं का खजुराहो" कहा जाता था । यह कस्बा मध्यकालीन कत्यूरी राजवंश (लगभग 700 से 1200 ईस्वी) की राजधानी था, जिन्होंने अल्मोड़ा स्थानांतरित होने से पूर्व यहाँ वास्तुकला के अद्भुत प्रतिमान स्थापित किए । कत्यूरी राजाओं ने यहाँ लगभग 55 से अधिक प्रस्तर (पत्थरों के) मंदिरों का निर्माण कराया, जिन्हें मुख्य रूप से 8 समूहों में विभाजित किया गया है । इन मंदिरों के निर्माण में गारे (मसाले) के स्थान पर आपस में जोड़ने के लिए लोहे के क्लैम्प और डावेल का उपयोग किया गया है ।
कत्यूरीमंदिरसमूहोंकापुरातात्विकवर्गीकरण
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मंदिरसमूहकानाम |
मुख्यआराध्यदेवता |
स्थापत्यकलाऔरशैली |
ऐतिहासिककाल / निर्माणसंवत |
वर्तमानसंरक्षणऔरस्थिति |
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बद्रीनाथसमूह |
भगवान विष्णु (बद्रीनाथ रूप) |
नागर शैली, गर्भगृह, अंतराल और मंडप से सुसज्जित |
संवत 1105 (1048 ईस्वी) |
मुख्य गर्भगृह में शालिग्राम की उत्कृष्ट विष्णु मूर्ति सुरक्षित है। |
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बनदेवमंदिर |
अज्ञात / वैदिक देवता |
अत्यंत प्राचीन पिरामिड जैसी संरचना |
10वीं शताब्दी ईस्वी |
यह खीरू गंगा नदी के किनारे खेतों के बीच एकांत में स्थित है। |
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गुर्जरदेवमंदिर |
भगवान शिव एवं विष्णु |
सेखड़ी शिखर और पंचरथ योजना के साथ अत्यंत नक्काशीदार मारू-गुर्जर शैली |
13वीं शताब्दी ईस्वी |
वर्तमान में जर्जर स्थिति में है, लेकिन कलात्मकता के मामले में क्षेत्र का सर्वश्रेष्ठ मंदिर है। |
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कचेरीसमूह |
शिव, विष्णु और देवी माँ |
तीन पंक्तियों में व्यवस्थित 12 लघु मंदिर और प्राचीन कुआँ |
11वीं - 13वीं शताब्दी ईस्वी |
एएसआई द्वारा संरक्षित, अतीत में तीर्थयात्रियों के ठहरने का स्थान रहा होगा। |
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मणियांसमूह |
जैन तीर्थंकर और हिंदू देवता |
सांझा प्रांगण वाले 9 मंदिर; चौखटों पर जैन तीर्थंकरों की आकृतियाँ |
11वीं - 13वीं शताब्दी ईस्वी |
पहाड़ी क्षेत्र में जैन धर्म के प्रभाव को दर्शाने वाला दुर्लभ ऐतिहासिक साक्ष्य। |
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मृत्युंजयसमूह |
भगवान शिव (मृत्युंजय रूप) |
नागर शैली का गर्भगृह, अंतराल और मंडप |
11वीं - 12वीं शताब्दी ईस्वी |
स्थानीय लोगों के लिए अत्यंत जाग्रत और सक्रिय पूजा स्थल। |
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रतनदेवसमूह |
त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) |
साझा मंच पर बने छह अक्षुण्ण मंदिर और विशाल मंडप |
11वीं - 13वीं शताब्दी ईस्वी |
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में आंशिक खंडहर रूप में मौजूद। |
ये मंदिर मध्यकाल में दिल्ली सल्तनत, मुगलों और 18वीं शताब्दी में रोहिल्ला सरदारों हफीज खान और बख्शी खान के आक्रमणों के कारण क्षतिग्रस्त हो गए थे । इसके बावजूद, आज भी ये मंदिर द्वाराहाट की गलियों में मौन खड़े इतिहास की गवाही देते हैं ।
आवासऔरआतिथ्यव्यवस्था
द्वाराहाट और कुकुछीना की यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए तीन मुख्य आवास विकल्प उपलब्ध हैं :
1. योगदासत्संगआश्रम: केवल YSS/SRF सदस्यों के लिए साधना के उद्देश्य से उपलब्ध है । यहाँ शांत और दिव्य आध्यात्मिक परिवेश मिलता है ।
2. जोशीगेस्टहाउस (कुकुछीना): बाबाजी की गुफा के ट्रेक के आरंभ बिंदु के पास स्थित है । यहाँ साधारण, साफ-सुथरे कमरे, स्थानीय भोजन (सात्विक थाली) और ट्रेकिंग गाइड की सुविधाएं (लगभग ₹1,200 से ₹1,500 प्रतिदिन) उपलब्ध हैं ।
3. KMVN महाशयपर्यटकविश्रामगृह (दूधौली): कुमाऊं मंडल विकास निगम (KMVN) द्वारा प्रबंधित यह विश्राम गृह द्वाराहाट से लगभग 15 किमी दूर दूनागिरी मार्ग पर दूधौली (मंगलीसैन के पास) स्थित है । यहाँ डबल बेड डीलक्स कमरे और पारंपरिक कॉटेज (हट्स) की व्यवस्था है, जिसका किराया ₹1,800 से ₹3,000 प्रति रात्रि के बीच है । यहाँ से हिमालय की चोटियों और सुंदर घाटी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है । सरकारी आईडी के साथ यहाँ बुकिंग प्राप्त की जा सकती है ।
निष्कर्षऔरसाधनाकाआध्यात्मिकमहत्व
द्वाराहाट और इसके आस-पास के साधना स्थल केवल भौगोलिक पर्वत श्रृंखलाएं या ऐतिहासिक पत्थर नहीं हैं, बल्कि ये चेतना के उच्च स्तर तक पहुंचने के सोपान हैं । जहाँ एक ओर कत्यूरी वास्तुकला के जीर्ण-शीर्ण मंदिर हमें मानव इतिहास की नश्वरता और कला की अमरता का पाठ पढ़ाते हैं, वहीं दूसरी ओर महावतार बाबाजी की गुफा और दूनागिरी का शांत परिवेश साधक को अंतर्मुखी होकर स्वयं को जानने के लिए प्रेरित करता है । चाहे वह भीमन-की-सैया बुग्याल की गूंजती हुई रहस्यमयी आवाज हो या कुकुछीना के घने जंगलों के बीच बहती गोगश नदी का शांत संगीत, द्वाराहाट की भूमि पर आज भी वह जाग्रत स्पंदन महसूस किया जा सकता है जो 1861 में लाहिड़ी महाशय ने अनुभव किया था । यह समूचा क्षेत्र अध्यात्म, इतिहास और प्रकृति प्रेमियों के लिए एक शाश्वत तीर्थस्थल है ।
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