Scriptural Reasoning
Karma Ka Siddhant: Understanding the Law of Karma, Action, and Results in Indian Philosophy
Read about Karma Ka Siddhant and its timeless message on action, consequences, responsibility, and spiritual growth. This article explains the law of karma in simple language, connecting it with Indian philosophy, ethical living, and self-development. A helpful resource for students, seekers, and readers interested in dharma and spiritual wisdom.
कर्म
इस ब्रह्मांड में कुछ भी कर्मों के अधिकार क्षेत्र से बाहर नहीं है । कर्म का अर्थ सबसे सामान्य शब्दों में 'क्रिया' है, और क्रिया भीतर से उत्पन्न होती है । अपनी आंतरिक मूल ऊर्जा के उपयोग से हुई क्रिया, यदि इसकी मूल दहलीज या सीमा (हमारी आंतरिक ऊर्जा की वो कम से कम मात्रा जिससे किसी क्रिया का भान होता है) से अधिक या कम मात्रा में है तो वो कर्म है । ऊर्जा प्रभाव का यह उपयोग हमारे आस-पास की प्रकृति पर तुरंत या कुछ विलम्ब से परिणाम उत्पन्न करता है । जो क्रिया की प्रतिक्रिया या कारण का प्रभाव कहा जाता है । तो इन दोनों का संयोजन, प्रकृति पर कार्यरत हमारी ऊर्जा और उस ऊर्जा के प्रभाव पर प्रकृति की प्रतिक्रिया वास्तव में कर्म कहा जाता है । व्यय की गई एक निश्चित राशि जल्द ही या बाद में समाप्त हो जाएगी । लेकिन प्रतिक्रिया खुद में एक नई क्रिया बन जाती है । यह ज्यादातर व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा पर निर्भर करता है । वह एक ही क्रिया पर गुस्से में प्रतिक्रिया कर सकता है या समान क्रिया पर स्नेह दिखा सकता है । व्याकरण में क्रिया से निष्पाद्यमान फल के आश्रय को कर्म कहते हैं । क्रिया और फल का संबंध कार्य-कारण-भाव के अटूट नियम पर आधारित है । यदि कारण विद्यमान है तो कार्य अवश्य होगा । यह प्राकृतिक नियम आचरण के क्षेत्र में भी सत्य है । अत: कहा जाता है कि क्रिया का कर्ता फल का अवश्य भोक्ता होता है ।

हम तीन श्रेणियों में हमारे द्वारा किए गए प्रत्येक कर्म को वर्गीकृत कर सकते हैं, और यहाँ कर्म का अर्थ केवल वह कार्य नहीं है जो हम शरीर के संचलन की क्रिया के साथ करते हैं, अपितु यह हमारे अंदर तीन प्रकार की प्रतिक्रियाओं का परिणाम है ।
पहले भौतिक कर्म शरीर के दृश्य आंदोलन या हमारे शरीर के हिलने डुलने के द्वारा किए जाते हैं, दूसरे बोलने द्वारा होते है- हमारा भाषण या वचन, या जो शब्द हम अपने मुँह से कहते हैं; और तीसरे मन या विचारों से है, जो हम अपने मस्तिष्क से सोचते हैं । इसलिए हर पल हम सभी कर्मों या कारणों और प्रभावों के नियमो से बंधे होते हैं ।
हम इन कर्मों को तीन श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं :
1) संचित कर्म : मृत्यु के बाद मात्र यह भौतिक शरीर या देह ही नष्ट होती है, जबकि सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों तक आत्मा के साथ संयुक्त रहता है । यह सूक्ष्म शरीर ही जन्म-जन्मांतरों के शुभ-अशुभ संस्कारों का वाहक होता है । संस्कार अर्थात हमने जो भी अच्छे और बुरे कर्म किए हैं वे सभी और हमारी आदतें । ये संस्कार मनुष्य के पूर्वजन्मों से ही नहीं आते, अपितु माता-पिता के संस्कार भी रज और वीर्य के माध्यम से उसमें (सूक्ष्म शरीर में) प्रविष्ट होते हैं, जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व इन दोनों से ही प्रभावित होता है । बालक के गर्भधारण की परिस्थितियां भी इन पर प्रभाव डालती हैं । ये कर्म 'संस्कार' ही प्रत्येक जन्म में संगृहीत (एकत्र) होते चले जाते हैं, जिससे कर्मों (अच्छे-बुरे दोनों) का एक विशाल भंडार बनता जाता है । इसे 'संचित कर्म' कहते हैं ।
2) प्रारब्ध कर्म : संचित कर्मों का कुछ भाग एक जीवन में भोगने के लिए उपस्थित रहता है और यही जीवन प्रेरणा का कार्य करता है । अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में प्रेरणा का कार्य करता है । अच्छे-बुरे संस्कार होने के कारण मनुष्य अपने जीवन में अच्छे-बुरे कर्म करता है । फिर इन कर्मों से अच्छे-बुरे नए संस्कार बनते रहते हैं तथा इन संस्कारों की एक अंतहीन श्रृंखला बनती चली जाती है, जिससे मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण होता है । दरअसल, इन संचित कर्मों में से एक छोटा भाग हमें नए जन्म में भोगने के लिए मिल जाता है । इसे प्रारब्ध कहते हैं । ये प्रारब्ध कर्म ही नए होने वाले जन्म की योनि व उसमें मिलने वाले भोग को निर्धारित करते हैं । हम कह सकते है की प्रारब्ध कर्म वो है जो शुरू हुआ है, और वास्तव में फल पैदा कर रहा है । यह संचित कर्मो के द्रव्यमान में से चुना जाता है । प्रत्येक जीवनकाल में, संचित कर्मो का एक निश्चित भाग जो उस समय आध्यात्मिक विकास के लिए सबसे अनुकूल है बाहर कार्य करने के लिए चुना जाता है । इसके बाद यह प्रारब्ध कर्म उन परिस्थितियों को बनाते है जिन्हें हम अपने वर्तमान जीवनकाल में अनुभव करने के लिए नियत हैं, वे हमारे भौतिक परिवार, शरीर या जीवन परिस्थितियों के माध्यम से कुछ सीमाएँ भी बनाते हैं, जिन्हें हम जन्मजात रूप से भाग्य के रूप में जानते है ।

अधिक आसानी से समझाने के लिए, मान लीजिए कि आपके संचित कर्म ऐसे हैं कि आपके उस समय तक अपने आने वाले जीवनो में 1000 कारणों का परिणाम सकारात्मक रूप से भोगना है और 500 कारणो का परिणाम नकारात्मक रूप से भोगना हैं । इसलिए इन कुल 1500 प्रभावों को आपके संचित कर्म कहा जाएगा । अब मान लें कि आपके द्वारा किये गए कर्मों के 300 सकारात्मक प्रभाव और 100 नकारात्मक प्रभावों को आपको अपने वर्तमान जीवन में उचित वातावरण द्वारा पक कर भोगने का मौका मिलेगा । तो वर्तमान जीवन के लिए आपके प्रारब्ध कर्म 300 + 100 = 400 होंगे ।
दरअसल हम ऊपर की तरह कर्मो की गणना नहीं कर सकते क्योंकि यह गणित की गणना के लिए बहुत ही जटिल मापदण्ड है और इसके द्वारा हम सूक्ष्म और साझा कर्मो की व्याख्या नहीं कर सकते है । मैंने आपको कर्मों की अवधारणा को स्पष्ट करने के लिए केवल संख्याओं द्वारा एक उदाहरण दिया है ।
जिस तरह से चोर को सहयता करने के जुर्म में साथी को भी सजा होती है ठीक उसी तरह काम्य कर्म और संचित कर्म में हमें अपनों के किए हुए कार्य का भी फल भोगना पड़ता है और इसीलिए कहा जाता है कि अच्छे लोगों की संगति करो ताकि कर्म की किताब साफ रहे । जिस बालक को बचपन से ही अच्छे संस्कार मिले हैं वो कर्म भी अच्छे ही करेगा और फिर उसके संचित कर्म भी अच्छे ही होंगे । अलगे जन्म में उसे अच्छा प्रारब्ध ही मिलेगा ।
3) क्रियमाण कर्म: ये वे कर्म हैं जो मनुष्य वर्तमान में बना रहा हैं, जिनके फल भविष्य में अनुभव किए जाएंगे । ये ही केवल वह कर्म हैं जिन पर हमें अपनी इच्छा शक्ति और मन की स्थिति के अनुसार चुनाव करने का अधिकार है । ये वो ताजा कर्म हैं जो हम प्रत्येक गुजरने वाले पल के साथ कर रहे है । वर्तमान जीवन और आने वाले जीवन में हमारे भविष्य का निर्णय करने के लिए ये कर्म ही संचित कर्मों का भाग बन जाते हैं ।
यहाँ यह प्रश्न उठता है कि जब प्रारब्ध कर्मो द्वारा यह पहले ही तय हो चुका है कि हर पल में हमारे साथ क्या होने जा रहा है, तो हम केवल स्वतंत्र इच्छा से ताजा कर्म कैसे बना सकते हैं, जिन्हे आप क्रियमाण कर्म कह रहे है?"
मैं आपको एक सरल उदाहरण द्वारा समझने का प्रयास करता हूँ, मान लीजिए कि तीन लोग एक पार्क या उद्यान में एक बेंच पर बैठे हैं । पहला व्यक्ति एक बड़ा व्यापारी व्यक्ति है, जिसके मस्तिष्क में हर पल व्यवसाय ही घूमता रहता है उसे धन और विलासिता आदि की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी वो इन्ही सब के विषय में सोचता रहता है । वह कई दान पुण्य के कार्य भी करता है लेकिन केवल लोगों को दिखाने के लिए कि वह दूसरों के लिए कितना करता है ।
दूसरा एक मध्यम श्रेणी का व्यक्ति है जो एक छोटी सी कंपनी में नौकरी कर रहा था लेकिन आज ही अपने मालिक द्वारा नौकरी से निकाल दिया गया है । तीसरा एक ऋषि है जिसका मन स्थिर है और वह अच्छे या बुरे पर ज्यादा ध्यान नहीं देता है । सभी पार्क के एक ही बैंच (बैठने का स्थान) पर बैठे हैं ।

कुछ समय पश्चात एक भिखारी आया और सबसे पहले व्यापारी व्यक्ति से कुछ पैसे देने का अनुरोध करने लगा । व्यापारी व्यक्ति ने चारों ओर देखा और पाया कि उसके आसपास कई लोग उसकी प्रतिक्रिया देख रहे हैं । तो उसने अपना हाथ अपनी जेब में डाला और अहंकार के साथ भिखारी को 500 रुपये का नोट दिया, और अपने आस-पास के लोगों को दिखाने के लिए अहंकार के साथ कहा कि वह एक बड़ा दाता है । साथ ही वह अपने मस्तिष्क में सोच रहा था कि कहाँ से यह बेवकूफ भिखारी आ गया । मुझे 500 रुपये का नुकसान हो गया । भिखारी ने उसे आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गया ।
इस स्थिति में व्यापारी व्यक्ति के प्रारब्ध कर्म ऐसे हैं कि वह पैसे दान करने में सक्षम है, लेकिन दान करते समय उसके मन या विचार की स्थिति कैसे थी (मन से कर्म), उसने मुँह से क्या बोला (वचन से कर्म), और उसकी शारीरिक प्रतिक्रया(शरीर से कर्म) क्या हैं या लोगो को कैसे नजर आते हैं यह उसके मन के भीतर उसकी इच्छा शक्ति और उसके ह्रदय की मानवता पर निर्भर करता है ।
इस विशेष उदाहरण में व्यापारी व्यक्ति अपने हाथों से भिखारी को पैसे देता है, इसलिए शारीरिक कार्य या सकल दिखाई देने वाले कर्म बेहद सकारात्मक हैं और व्यापारी व्यक्ति के क्रियमाण कर्मो पर सकारात्मक प्रभाव डालेंगे, लेकिन दान करते समय वह अपने मस्तिष्क में भिखारी के लिए बुरा सोच रहा है । तो उसके मन के नकारात्मक प्रभाव या नकारात्मक विचार उसके क्रियमाण कर्मो पर नकारात्मक प्रभाव डालेंगे । इसके अतरिक्त वह अपने भाषा में अहंकार का प्रयोग कर रहा है, इसलिए कुछ अहंकारी छाप भी उसके क्रियमाण कर्मो में जोड़ जाएगी । इसलिए व्यापारी व्यक्ति के जीवन में इस घटना के परिणामस्वरूप कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक क्रियमाण कर्म बनेंगे । जल्द ही भिखारी ने व्यापारी व्यक्ति को आशीर्वाद दिया । आशीर्वाद और शाप हर किसी के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, इसलिए इस उदहारण में, व्यापारी व्यक्ति के जीवन में कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक कारणों के साथ आने वाली समग्र घटनायें भिखारी द्वारा दिए गए आशीर्वाद के कारण बहुत ज्यादा नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न नहीं करेंगी ।
तो संक्षेप में आप समझ सकते हैं कि किसी कार्य का प्रभाव वास्तव में कारण + परिस्थितियाँ + इच्छा शक्ति + वरदान या और अभिशाप होता है ।
दूसरी ओर भिखारी ने सच्ची भावनाओं के साथ व्यापारी व्यक्ति को आशीर्वाद दिया । तो यह भिखारी के क्रियमाण कर्मो पर सकारात्मक प्रभाव जोड़ देगा ।
अब दूसरी परिस्थति लेते है जब भिखारी मध्य-वर्ग के व्यक्ति के पास जाकर उससे धन का अनुरोध करता है जिसे आज ही नौकरी से निकल दिया गया है, और वह नकारात्मक विचारों से भरा हुआ है । जैसे ही भिखारी उसके पास आता है और कुछ पैसे माँगता है, वह मध्य-वर्गीय व्यक्ति भिखारी को बुरे शब्द कहता है । वह शारीरिक रूप से उसे नुकसान भी पहुँचा सकता है क्योंकि वह क्रोध से भरा हुआ है । लकिन कुछ समय बाद, अपने मस्तिष्क में वह पश्चाताप करता है कि उसने उस भिखारी के साथ गलत किया और यह भी सोचता है कि "वह भिखारी मेरे से भी ज्यादा बुरी स्थिति में था । मैं उसकी सहयता करने में असमर्थ रहा, भगवान मेरी गलती को माफ कर दें"
दूसरी ओर, जब भिखारी इस मध्यम वर्ग के व्यक्ति के पास से बिना पैसे मिले निराश होकर दूर चला जाता है तो वह अपने मन में सोचता है की उस व्यक्ति के साथ कुछ बुरा हो जाये और उसे अपने जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़े । यहाँ तक कि भिखारी यह भी सोच सकता है "की हे भगवान उस व्यक्ति की दुर्घटना में मृत्यु हो जाये" इसलिए इस स्थिति में दोनों के क्रियमाण कर्म बिलकुल ही अलग होंगे ।
अब जब भिखारी तीसरे व्यक्ति एक ऋषि के पास पहुँचता है और पैसे की आशा के बिना उससे पैसे देने का अनुरोध करता है (क्योंकि उसकी सारी उम्मीदें उस मध्यम वर्ग के आदमी के साथ वार्तलाप से ख़त्म हो चुकी है)। वह ऋषि उसे मुस्कुराते हुए कहता है, "मेरे प्रिय भाई, मेरे पास आपको देने के लिए पैसे नहीं हैं लेकिन मैं आपको कुछ कार्य करने का मार्ग सुझा सकता हूँ ताकि आप पैसे कमा सकें और अन्य लोगों की सहयता भी कर सकें । "इस स्थिति ऋषि के क्रियमाण कर्मो में सकरात्मकता बढ़ेगी । लेकिन वास्तव में भिक्षु, ऋषि इत्यादि कर्मों के कानून से बहुत ही कम बंधे होते हैं ।
सभी कारणों और प्रभावों के विषय में सटीक रूप से परिभाषित करना असंभव है, लेकिन हम जितना संभव हो सकता है उतना करीब से उन्हें समझने का प्रयत्न कर सकते हैं । तो अब आप समझे कि कर्म कैसे प्रभावी होते हैं? हमारे उदाहरण में यह तीनों व्यक्तियों के प्रारब्ध कर्मो में लिखा हुआ था कि एक भिखारी उनके पास आकर पैसे माँगने की विनती करेगा, लेकिन सभी तीनों की उस भिखारी की समान क्रिया पर प्रतिक्रया अलग-अलग थी । और तीनो व्यक्तियों का यह अलग-अलग व्यव्हार तीनों के मस्तिष्क की अलग स्थिति के कारण है जो कि सभी पिछले कर्मों के सामूहिक परिणाम के अतरिक्त और कुछ भी नहीं है । सकल जीवन में किए गए कार्य और हमारे मस्तिष्क के विचार हमारे सूक्ष्म शरीर पर एक छाप छोड़ते है और फिर ऐसी ही कई छापे मिलकर हमारी आदत बन जाती है । जो लंबे समय तक हमारी स्वतंत्र इच्छा की दिशा तय करती है ।
प्रश्न यह भी है कि दूसरा व्यक्ति जो दिल से बुरा नहीं है, लेकिन अपनी नौकरी खोने के कारण परेशान था, यहाँ तक कि वह भिखारी के जाने के बाद अपने मन में भिखारी के लिए खेद भी व्यक्त करता है । तो इसका अर्थ है कि उस समय उसके आस-पास की परिस्थितिया और उन परिस्थितियों में उसकी इच्छा शक्ति को उपयोग करने के विवेक के कारण उसने भिखारी के प्रति इस तरह की प्रतिक्रिया व्यक्त की होगी"
भ्रम यह है कि दूसरे व्यक्ति के लिए हालात ऐसे थे जिसमे उसने अपनी इच्छा शक्ति को उपयोग करने का विवेक खो दिया और भिखारी के साथ बुरा व्यव्हार किया । तो उस दूसरे व्यक्ति के लिए परिस्थितियाँ या हालात खराब थे ना की वह व्यक्ति स्वयं, क्योंकि उसे उसी दिन उसे नौकरी से निकल दिया गया था । तो इसमें गलती तो परिस्थितियों की है उस दूसरे व्यक्ति की नहीं तो फिर उसके क्रियमाण कर्मो में नकरात्मकता क्यों जुड़ेगी"

हाँ, लेकिन यहाँ पर दो बाते महत्वपूर्ण हैं: सबसे पहली, वह व्यक्ति अपने पिछले कार्यों के द्वारा खुद के लिए ऐसी परिस्थितियों को बनाने के लिए स्वयं जिम्मेदार है । उसे अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा, इसमें अवश्य ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनके ही कुछ पूर्व कर्म शामिल रहे होंगे । पूरा जीवन अनुक्रम कुछ भी नहीं बल्कि कारण और प्रभाव की एक निरंतर श्रृंखला ही तो हैं । जब एक कारण और प्रभाव श्रृंखला समाप्त होती है, तो जीवन एक और अपरिपक्व कारण चुनता है जो की उन परिस्थितियों में परिपक्व होने वाला होता है, और कारण और प्रभाव की एक और नयी श्रृंखला शुरू हो जाती है । कारण और प्रभाव की एक श्रृंखला की प्रक्रिया के दौरान, निश्चित रूप से स्वयं या जिन लोगों के साथ हमने कर्म साझा किया है, उनके अन्य कारणों की कुछ भागीदारी संभव है । इसी तरह एक कारण और प्रभाव श्रृंखला परिणाम पूरी तरह से या आंशिक रूप से नई श्रृंखला का कारण हो सकता है । यह समझने के लिए एक जटिल परिदृश्य है । हम यह नहीं कह सकते हैं कि किस कारण और किस समय के कारण, मध्यम वर्ग के व्यक्ति को अपनी नौकरी खोनी पड़ी ।
दूसरी बात यह है कि उन परिस्थितियों को स्वयं उस व्यक्ति द्वारा बनाया गया था, इसलिए उन्हें उन परिस्थितियों का सामना करने के लिए उसे सकरात्मक इच्छा शक्ति को दिखाना होगा, बिना मस्तिष्क को परेशान किए । और इसके लिए सबसे अच्छा उपाय कठिन समय पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाना है ।
कुछ कर्मों की सकारात्मकता या नकारात्मकता हम भ्रम के कारण भी पैदा करते हैं, जो कारण और प्रभाव के पूरे अनुक्रम को ही बदल सकते हैं । महाभारत में इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण है ।
द्रौपदी के चीरहरण (अर्थ : चीर अथार्त कपड़े और हरन का अर्थ है बलपूर्वक छीनना), के समय उसने सभी महान योद्धाओं के नामों को एक-एक करके पुकारा, लेकिन उनमें से कोई भी उसकी सहयता करने के लिए आगे नहीं आया । बढ़ते तनाव में, कर्ण असमंजस में था । एक ओर दुर्योधन के साथ उसकी मित्रता और द्रौपदी द्वारा पूर्व में किया गया अपमान था । दूसरी ओर, एक स्त्री का घोर अपमान उसकी उपस्थिति में हो रहा था । तभी वह एक सभ्य योद्धा की तह निर्णय तक पहुँचा की वह दुशानन के हाथों को रोकेगा । वह अपने दोस्त के द्वारा हो रहे अधर्म को रोकेगा । वह एक स्त्री के सम्मान के लिए लड़ेंगा । वह बस द्रौपदी की एक पुकार का इंतजार करने लगा ।
द्रौपदी पद्मनाभन (अर्थ : कमल के समान नाभि) का नाम पुकारा, जो कर्ण के बराबर में बैठा था, और जिसने अपना सिर नीचे कर रखा था । पर वह नहीं उठा । जब द्रौपदी कर्ण के सामने आयी तो वह खड़ा हुआ उसे बचाने ओर कौरवो के साथ लड़ने के लिए, परन्तु द्रौपदी ने केवल कर्ण की ओर देखा ओर बिना कुछ कहे वो आगे बढ़ गयी । इससे कर्ण को बहुत क्रोध आया । उसने सोचा की हो सकता है कि द्रौपदी उसे इतना तुच्छ समझती है कि ऐसी स्थिति में भी, वह एक निचली जाति के योद्धा से सहयता नहीं लेना चाहती ।
आखिरकार, एक अन्य कौरव, विकर्ण (अर्थ : विकर्ण शब्द के अर्थ दो विपरीत अर्थ है । असल में यह दो शब्दों से बना है । पहला शब्द वीना या विशाल है, जबकि दूसरा शब्द कर्ण है । वीना का अर्थ है 'बिना' और विशाल का अर्थ 'बड़ा' है । और कर्ण का अर्थ 'कान' है । तो इस नाम में दो अर्थ हैं । या तो 'वह है जिसके कान नहीं है या जो किसी की भी बात सुनता नहीं है' या 'बड़े कानो वाला या जो सबकी बात सुन लेता है') उठा और उसने इस बुरे कार्य का विरोध किया ।
यहाँ पर कर्ण ने एक गलती की । अपने क्रोध में, उसने द्रौपदी को पाँच पतियों वाली एक अनुग्रहकारी स्त्री के रूप में अपमानित किया । इसने विकर्ण को चुप कर दिया और दुशासन (अर्थ : बुरा शासन) को प्रोत्साहित किया । अंत में, उसने भगवान कृष्ण को पुकारा जिन्होंने उसे बचाया । बाद में, कर्ण को एहसास हुआ कि द्रौपदी ने कर्ण के प्रति अपने पुराने व्यवहार पर पछतावे और शर्म की वजह से उसे नहीं पुकारा था । गलतफहमी और भ्रम के कारण कर्ण ने खुद के लिए बहुत ज्यादा नकारात्मक क्रियमाण कर्मो का निर्माण कर लिया था । अब कर्मो का सिद्धांत कुछ स्पष्ट हुआ?"
हम परिस्थितियों और उन परिस्थितियों का सामना करने की हमारी इच्छा शक्ति के अनुसार भी तीन प्रकारों में कर्मों को वर्गीकृत कर सकते हैं :
1) सबसे पहले को 'द्रिधा' या निश्चित कर्म कहा जाता है, यह वो है जिन्हे हमें निश्चित परिस्थितियों में करना पड़ता है और हमारे पास कोई विकल्प नहीं होता है उन परिस्थितियों को बदलना का । कर्मों की इस श्रेणी में, हमें दिव्य इच्छा के अनुसार परिस्थितियों के साथ प्रवाह होना होगा । इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे हमारे कितने विपरीत हैं । अगर हम अपनी इच्छा के अनुसार परिस्थितियों के प्रवाह को बदलने की कोशिश करते हैं, तो कर्मों की इस श्रेणी में यह संभव नहीं हो सकता है, और यह हमारे नकारात्मक संचित कर्मों को बढ़ाएगा । क्योंकि अगर परिस्थियाँ हमारे अनुसार नहीं जाती हैं, तो हम क्रोधित हो जाते हैं और बुरे कर्म करते हैं जो नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करते हैं । उदाहरण के लिए हम सड़क पर जा रहे हैं और हमारे साथ एक दुर्घटना हो जाती है ओर कोई हमे टक्कर मर देता है, जिस पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है । हमें उस दुर्घटना का सामना करना पड़ेगा वो भी बिना किसी बहस किये या उस व्यक्ति के विषय में मस्तिष्क में कुछ भी बिना बुरा सोचे जिसने हमें टक्कर मारी है । आम तौर पर ये कर्म हमारे जीवन का वह समय होता है जिसमे हमारे धैर्य की जाँच होती है अथार्त विपरीत परिस्थितियों में हमारे कथन(भाषण), विचार और शारीरिक हाव भाव पर हमारा कितना नियंत्रण है । भिखारी के हमारे उदाहरण में, दूसरा व्यक्ति (एक मध्यम वर्ग का आदमी) जिसे की उसके कार्य से बेदखल कर दिया गया था वास्तव में जीवन में उस समय अपने द्रिधा कर्म से गुज़र रहा था ।
2) दूसरे को 'द्रिधा-अद्रिधा' या मिश्रित कर्म कहा जाता है । द्रिधा कर्मा की तुलना में इस श्रेणी में हमारे कर्मों के द्वारा परिस्थिति को बदलने की थोड़ी सी संभावना होती है । इन कर्मो में परिस्थितियाँ हमारे भाग्य और हमारी स्वतंत्र इच्छा पर सामान रूप से निर्भर करती है । यदि हमारी स्वतंत्र इच्छा मजबूत है तो हम परिस्थितियों के उत्पादन को इस वर्ग के कर्मो में सकारात्मक और नकारात्मक की ओर हमारे अनुसार अधिक स्पष्ट रूप से बदल सकते हैं । उदाहरण के लिए मान लीजिए कि आपके एक मित्र ने आपको किसी बुरे कार्य को करने के लिए आमंत्रित किया है । अब यह आप पर निर्भर है कि यदि आपकी इच्छा शक्ति आपके मित्र की इच्छा शक्ति से कमजोर है, तो आप अपने दोस्त के कथन का पालन करेंगे और आपके संचित कर्मो में कुछ नकारात्मक कर्म जोड़ देंगे । लेकिन अगर आपकी इच्छा शक्ति काफी मजबूत है तो आप अपने मित्र को मना कर देंगे, जिससे की आपके संचित कर्मों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा । मान लीजिए कि आपके पास बहुत मजबूत इच्छा शक्ति है इतनी की आप अपने दोस्त को भी वो बुरा कार्य करने से रोक सकें तो यह आपके संचित कर्मो पर बहुत अधिक सकारात्मकता जोड़ देगा ।
3) तीसरे को अद्रिधा कर्म या गैर निश्चित कर्म कहा जाता है । कर्मों की इस श्रेणी में केवल आपकी मुक्त इच्छा शक्ति कार्य करती है, और प्रकृति की इच्छा से कार्य करने के लिए आपको कोई परिस्थिति बाध्य नहीं कर सकती है । इस श्रेणी में आपकी स्वतंत्र इच्छा और मानसिक स्थिति (जो आपके पिछले कर्मों के प्रभाव का कारण है) आपके कर्मों को सकारात्मक या नकारात्मक बना सकती है । उदाहरण के लिए आप बाजार में जाते हैं और यह आप पर निर्भर करता है कि आप सबके लिए जहर खऱीद कर लाते है या मिठाई ।
यदि हम इन तीनों कर्मों को बारीकी से देखते हैं, तो हम पाएंगे कि पहले कर्मो 'द्रिधा' में सभी अथार्त पर्यावरण, आसपास के लोगों, हमारे विचार आदि हमारे विरुद्ध हैं । द्रिधा कर्मो के पकने के समय के दौरान, आम तौर पर केवल हमारे नकारात्मक कर्म ही हमारे जीवन में आते हैं । तो इस प्रकार के कर्मो के समय में हमारे शारीरिक कर्म, वचन और विचारो को नियंत्रित करना बहुत कठिन होता है । लेकिन अगर हम ऐसा करने में सक्षम होंगे और हम अपनी इच्छा शक्ति से शरीर, मुँह या विचार को नियंत्रित कर पायेंगे, और ब्रह्मांड की योजना के प्रवाह साथ चलेंगे अथार्त ये मान लेंगे की इस समय मेरे साथ ऐसा ही होना था तो भविष्य के लिए हमारे द्रिधा या नकारात्मक कर्म बहुत कम होने लगेंगे ।
इसी प्रकार 'द्रिधा-अद्रिधा' कर्मो में कुछ परिस्थियाँ और वस्तुएँ हमारे समर्थन में होती हैं और अन्य हमारी विरूद्ध और 'आद्रिधा' में सभी चीजें प्रकर्तिक या सहायक होती हैं और हमारी इच्छा के अनुसार हमारी सहयता कर सकती हैं ।
लेकिन हम यह कैसे जान सकते हैं कि कौन सा समय हमारे 'द्रिधा' कर्मो का है कौन सा 'द्रिधा-अद्रिधा' और कौन सा अद्रिधा का?"
आम लोगों के लिए कर्मों के अनुसार परिस्थितियों में अंतर करना थोड़ा मुश्किल है । लेकिन कुछ तरीके हैं । सबसे पहले हम अपने आस-पास के वातावरण का हमारे ऊपर प्रभाव की जाँच कर सकते हैं । अगर ऐसा लगता है कि यह हमारे विरुद्ध है, तो वह 'द्रिधा' कर्मो को ख़त्म करने और प्रतिक्रिया के बिना दिव्य इच्छा के साथ बहने का समय है । और यदि आस-पास के वातावरण का कुछ प्रभाव सकरात्मक एवं कुछ नकरात्मक तब यह 'द्रिधा-अद्रिधा' कर्मो का समय है और अगर सहायक हो, तो या समय है 'अद्रिधा' कर्मो का जिसमे सकारात्मक क्रियमाण कर्म करके अपने संचित कर्मो को आसानी से सकरात्मक किया जा सकता है । हम अपने शरीर, जीवन शैली, दैनिक दिनचर्या, मनोविज्ञान, आसपास की प्रकृति इत्यादि में परिवर्तन का विश्लेषण करके अनुमान लगा सकते हैं । लेकिन सबसे अच्छा ओर सरल तरीका जन्म कुंडली में महा दशाओ (ग्रहो के प्रभाव की मुख्य अवधि) और अंतर दशाओ (ग्रहो के प्रभाव की उप अवधि) में ग्रहों की स्थिति की जाँच करना है ।
आम तौर पर शनि, राहू और केतु की दशाये वह समय होता है जब हमारे 'द्रिधा' कर्म सक्रिय होते हैं, मंगल, चंद्रमा और बुद्ध की दशाये वह समय होता है जब हमारे 'द्रिधा-अद्रिधा' कर्म सक्रिय होते हैं, इसी प्रकार बृहस्पति, शुक्र और सूर्य की दशाये वह समय होता है जब हमारे 'अद्रिधा' कर्म सक्रिय होते हैं । लेकिन यह हर परिस्थिति में सत्य नहीं है । वास्तव में यह विभिन्न ग्रहों की स्थिति, ताकत और संयुक्त ऊर्जा के प्रभाव पर निर्भर करता है । सत प्रतिशत यह कहना कठिन है की केवल किसी एक या दो ग्रहो की दिशा से हम बता सके की हमारे कौन से कर्म सक्रिय है , लेकिन हाँ, एक अच्छा ज्योतिषी सारी गणनाये करके एक दम सही सही समय बता सकता है कि किस समय कौन से कर्म सक्रिय हैं या होंगे"
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